मौन रहकर मैं
मुखर होना सीख रही हूँ
समझदारी के बटखरों से
शब्दों का वजन
मैं भी आजकल
तौलना सीख रही हूँ।
रिक्त से कैनवास पर
इंद्रधनुषी सी कोई तस्वीर
बिन रंगों की पहचान,
उकेरना सीख रही हूँ।
घनी सी उलझन की,
उलझी सी गांठों को
मन की उंगलियों से,
खोलना सिख रही हूँ।
भ्रमित हूं, चकित हूं
दुनिया के ढंग देखकर
बन रही हूं कुशल
नए कौशल सिख रही हूँ।
भौतिक नश्वरता के दौर में
मै भी आजकल
दुनियादारी सीख रही हूँ।
शुक्रिया तुम्हारा, तहेदिल से
तुमने ठुकराया ,
आज मैं जिंदादिली से
जिंदगी के पन्नों पर
खुद को लिख रही हूँ।
