Poetry 1 min read 619K reads

क्रोध


क्रोध की ज्वाला जब फटती हैअपने साथ-साथ कितनों को

अग्नि में हवन करती हैआखिर कब तक दबा रहेगा

अंदर में खंजर सा चुभ रहा हैकोई सुनकर भी अनसुना कर रहा है

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