साथी बनने की खातिर
साथ में होना पड़ता है
हाथों में हाथ रहे न रहे
पास में होना पड़ता है
जीवन की अंजान राहों पर
पथ के काँटों को सहकर
प्रतिपल आगे बढ़ना पड़ता है
साथ में चलना पड़ता है
अहंकार की बलि चढ़ाकर
अधिकारों को भुलाकर
समझौतों से गुजरना पड़ता है
विषामृत पीना पड़ता है।
मं शर्मा (रज़ा)
