Poetry 1 min read 618.6K reads

विषमताएँ


सच्ची बातें भी अब तोझूठी सी लगती हैंमीठी मुस्कानें भी अक्सरफीकी सी लगती हैं

विषमताएँ न हों तोजिंदगी बोझिल लगती हैमिठास अधिक हो जाए तोमिठाई कड़वी लगती है ।

मं शर्मा (रज़ा)

Read more Earn more Learn more