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विष -अमृत


कुछ अनसुलझे सवालों केजवाब ढूढने लगा हूँअपने ही सिद्धांतों काउल्लंघन करने लगा हूँ

तन्हाई के शोर से बचकरएकांत के कुछ पल जी रहा हूँऐसी मुर्दनी छाई जीवन मेंलगे विष को अमृत समझ पी रहा हूँ।

मं शर्मा (रज़ा)

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