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विरक्त


झड़ गए पात सभीख्वाब हुए पस्त हैंहरा भरा दरख्त कभीआज क्यूँ निर्वस्त्र है

जीने की अभिलाषा मेंआकंठ आसक्त थाहवा का रूख बदलते हीक्यों हुआ विरक्त है।

मं शर्मा (रज़ा)

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