काली चादर ओढ़ केकब से सोई है विभावरीचल उठ आलस छोड़ देभोर होने को है बावरी ।मं शर्मा (रज़ा)
काली चादर ओढ़ केकब से सोई है विभावरीचल उठ आलस छोड़ देभोर होने को है बावरी ।
मं शर्मा (रज़ा)