बेजान खिलौना न समझ मुझे
मैं हाड़ माँस का पुतला हूँ
कागज़ पे लिखी दास्तां नहीं
मैं जीता जागता दुखड़ा हूँ
डराती हैं लहरें मुझको
गरज भरी गर्जनाओं से
पीछे नहीं लौटना मुझको
डर की इन वर्जनाओं से
डूब के जाऊँ कि तैर जाऊँ
एक बार उधर तो जाना है
सागर के सीने पे चढ़ कर
उस पार उतर जाना है ।
मं शर्मा (रज़ा)

