तू एक विशाल वृक्ष घना सामैं नाजुक कोमल वल्लरी हूँजब तक लिपटी हूँ तेरे तन सेमैं फलती फूलती सुरक्षित हूँमत करना मुझे खुद से जुदामैं तुझ पर ही तो आश्रित हूँ।मं शर्मा( रज़ा)
तू एक विशाल वृक्ष घना सामैं नाजुक कोमल वल्लरी हूँजब तक लिपटी हूँ तेरे तन सेमैं फलती फूलती सुरक्षित हूँमत करना मुझे खुद से जुदामैं तुझ पर ही तो आश्रित हूँ।
मं शर्मा( रज़ा)