लो भोर भई

फैला उजियारा

पंछी उड़ चले नभ में

छोड़ छाड़ के घर द्वारा


नदिया में नावें जा छूटीं

पीछे रह गया किनारा

चरवाहे ले चले गैंया को

गले में बजता जाए घंटारा


चहुंओर शक्ति का संचार हुआ

किरणों का खुल गया पिटारा

सृष्टि नत मस्तक हो उठी

शिवालय से उठा जयकारा।



मं शर्मा (रज़ा)