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त्याग


बारिश की रिमझिम बूँदों सेमेरा खिल उठता है तन मनगीली मिट्टी की खुशबू सेझूम उठता है ये बैरागी मन

पानी में तैरती कागज़ की नावेंफिर बचपन में खींच लाई हैंसिद्धार्थ नहीं मैं त्याग के चलदूँसुख दुख की इन संपदाओं को।

मं शर्मा( रज़ा)

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