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तुम सा


मैं सुख में दुख मेंधूप में छाँव मेंएकसा रहना चाहता हूँतुमसा होना चाहता हूँ

जीवन में अभाव नहींफिर भी ठहराव नहींकुछ कमी है बाकीतुम सा फिर भी नहीं।

मं शर्मा (रज़ा)

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