कुछ दरख्त टूट गएकुछ जड़ों से उखड़ गएसमय की आँधियों मेंजानदार जान से गएनियति से प्रताड़ित कुछठूँठ ही अवशेष रहेत्रासदियों में पले बढ़े हमअकेले ही चल पड़े ।मं शर्मा (रज़ा)
कुछ दरख्त टूट गएकुछ जड़ों से उखड़ गएसमय की आँधियों मेंजानदार जान से गए
नियति से प्रताड़ित कुछठूँठ ही अवशेष रहेत्रासदियों में पले बढ़े हमअकेले ही चल पड़े ।
मं शर्मा (रज़ा)