तेरी झलक को ऐ जिंदगीउम्र भर भागते फिरेतू चंचला द्रुतगामिनीजीवन भर दिखी नहींराहें छूटीं साँसें टूटींतेरी तंद्रा न टूटी कभीमरूभूमि की मृगतृष्णा सीघड़ी घड़ी छल करती रही।मं शर्मा( रज़ा)
तेरी झलक को ऐ जिंदगीउम्र भर भागते फिरेतू चंचला द्रुतगामिनीजीवन भर दिखी नहीं
राहें छूटीं साँसें टूटींतेरी तंद्रा न टूटी कभीमरूभूमि की मृगतृष्णा सीघड़ी घड़ी छल करती रही।
मं शर्मा( रज़ा)