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तेरे खेल


कभी मुझसेखफा हैकभी मुझपेफिदा हैतेरी अदासबसे जुदा है

कभी देताकभी लेता हैकभी चढ़ाताकभी गिराता हैघड़ी घड़ी क्योंआज़माता है

खेल तेरेखिलाड़ी तेरेजैसा चाहेवैसा खिला लेबस शरण मेंअपनी रहने दे ।

मं शर्मा (रज़ा)

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