एक तन्हा शामनदिया के तीर पेलिख रही थी गज़लनज़रों के तीर सेलहरों ने ओढ़ी जोखामोशी की सरगमसुना रही थी गजलकिनारे से टकरा के ।मं शर्मा (रज़ा)
एक तन्हा शामनदिया के तीर पेलिख रही थी गज़लनज़रों के तीर से
लहरों ने ओढ़ी जोखामोशी की सरगमसुना रही थी गजलकिनारे से टकरा के ।
मं शर्मा (रज़ा)