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ताब


बादलों में धूप कहाँ हैधूप में तपिश कहाँ हैठिठुरे ठिठुरे से दिनों मेंपहले जैसी बात कहाँ है

देर से आना जल्दी जानासूरज भी मुस्तैद कहाँ हैहमें पहन गर्माएँ कपड़ेउनमें बची वो ताब कहाँ है।

मं शर्मा (रज़ा)

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