चोटिल हुआ हूँ
तपाया गया हूँ
ठोक बजा कर
परखा गया हूँ
सब सह गया हूँ
तब ही निखरा हूँ
यूँ ही नहीं मैं
स्वर्ण कहाया हूँ
खूब चमकता हूँ
महँगा बिकता हूँ
सबकी चाहत हूँ
श्रंगार की आदत हूँ
ऊँचा मुकाम है
श्रेष्ठ मेरा दाम है
कवि की कल्पना में
सौन्दर्य का बखान हूँ ।
मं शर्मा (रज़ा)
