दुनिया के इस कोलाहल मेंसुकून का पल कहाँ बंद हैखुशियाँ तो बुलंद हैं लेकिनचेहरे की हँसी कहाँ स्वच्छंद हैनित अभावों का दंश झेलतेजीवन में आनंद कहाँ हैयूँ सफर में सभी हैं लेकिनसंग चलने वाला संग कहाँ है।मं शर्मा (रज़ा)
दुनिया के इस कोलाहल मेंसुकून का पल कहाँ बंद हैखुशियाँ तो बुलंद हैं लेकिनचेहरे की हँसी कहाँ स्वच्छंद है
नित अभावों का दंश झेलतेजीवन में आनंद कहाँ हैयूँ सफर में सभी हैं लेकिनसंग चलने वाला संग कहाँ है।
मं शर्मा (रज़ा)