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सुरभित


दिवस के खामोश कोने मेंअतीत के मुड़े पन्नों कोधड़कनों की आरामगाह मेंजब भी उलट पलट देखास्निग्ध सुरभित यादों का एकशीतल झोंका छूकर गुज़र गया।

मं शर्मा (रज़ा)

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