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सूखे गुलाब


सुलगा कर यादों के दीएजागती सी रातों मेंगढते रहे कोई ख्वाबअंधेरो की परतों में

महकते रहे सूखे गुलाबडायरी के पन्नों मेंरह गई अधूरी दास्तानखो गए कलम दराज़ों में।

मं शर्मा (रज़ा)

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