हल हँसिया भाल और कुदालरख कर अपने कांधे पे संभालदेखो शान से श्रमवीर चला हैविपदा में बन जाने को ढालकंचन सा चमके माथे पे पसीनातन पर धारे वस्त्र एक झीनाफौलादी इरादों से करता प्रहारखोल रहा है खुशहाली के द्वार।मं शर्मा (रज़ा)
हल हँसिया भाल और कुदालरख कर अपने कांधे पे संभालदेखो शान से श्रमवीर चला हैविपदा में बन जाने को ढाल
कंचन सा चमके माथे पे पसीनातन पर धारे वस्त्र एक झीनाफौलादी इरादों से करता प्रहारखोल रहा है खुशहाली के द्वार।
मं शर्मा (रज़ा)