तुम कब आँखों से ओझल हुएतुम कब स्मृति से विस्मृत हुएतेरे विशाल सागर से ह्रदय मेंहम थोड़ी सी जगह को तरसेसमय के थपेड़ों को अनदेखा करतेरे नाम की नैया में रहे विचरते।मं शर्मा( रज़ा)
तुम कब आँखों से ओझल हुएतुम कब स्मृति से विस्मृत हुएतेरे विशाल सागर से ह्रदय मेंहम थोड़ी सी जगह को तरसेसमय के थपेड़ों को अनदेखा करतेरे नाम की नैया में रहे विचरते।
मं शर्मा( रज़ा)