धरती की प्यास को

सूरज के ताप को

कौन रोक सका है भला

नदिया की धार को


जीवन की थकन को

चेहरे की शिकन को

कौन जीत सकता हैभला

पराजित मन को ।


मं शर्मा (रज़ा)

#स्वरचित