संगम के तट पर

भीड़ से हट कर

लहरों को निहारता

एक साया बैठा है


ध्यान में डूबा हुआ

अपने में खोया सा

लहरों को गिनता हुआ

तपस्वी सा लगता है


पल में फिर ओझल हुआ

शायद मेरा स्वपन था

भीड़ में एकांत ढूँढता

शायद वो मैं ही था।



मं शर्मा (रज़ा)