सर्द हवाओं ने फिर
मचाई तबाही है
तौबा तौबा करते
जान मुँह को आई है
ये कैसी सजा पाई है
पानी गर्म होता नहीं
चाय गर्म रहती नहीं
लफ्ज़ जम गए जैसे
मुँह में बर्फ जमाई है
ये कैसी सज़ा पाई है
सूरज उगा नहीं कब से
जाने कब निकले घर से
मैं ही कैसे जुर्रत कर लूँ
माँ ने रसद मँगवाई है
ये कैसी सजा पाई है ।
मं शर्मा (रज़ा)


