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संजीवनी


धीमे धीमे बरखा आईमीठी सुगंध धरती पे छाईकण कण प्यासी धरती कीतृष्णा ने पूर्ण तृप्ति पाई

आलस ने जब ली अँगड़ाईचहुँओर उमंग सी छाईमुरझायी कोपलें जी उठींमानो जीवनामृत संजीवनी पाई।

मं शर्मा( रज़ा)

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