मन के तहखाने में
यादों का एक संदूक है
एकांत के खास पलों में
भारी मन के कुछ क्षणों में
जब में उदास होता हूँ
केवल अपने साथ होता हूँ
संदूक को खोल कर
यादों के सफर पे निकलता हूँ
रसोई में व्यस्त माँ मिलती है
झोला थामे पिता आते हैं
मैं झट कांधे पर चढ़ता हूँ
खुद को राजा मान
उनकी सवारी करता हूँ
मन ही मन इतराता हूँ
राजसी उस ठाठ बाट को
फिर से जीने लगता हूँ ।
मं शर्मा (रज़ा)
