चाँद सारी रात जागारात की छत परस्वपन बिखर बिखर गएभोर की आमद परशामियाने लगाए जोकल रात भरउखडे पड़े हैं आँगन मेंसच की आँधी झेल कर।मं शर्मा (रजा)
चाँद सारी रात जागारात की छत परस्वपन बिखर बिखर गएभोर की आमद पर
शामियाने लगाए जोकल रात भरउखडे पड़े हैं आँगन मेंसच की आँधी झेल कर।
मं शर्मा (रजा)