Poetry 1 min read 592K reads

शामियाने


चाँद सारी रात जागारात की छत परस्वपन बिखर बिखर गएभोर की आमद पर

शामियाने लगाए जोकल रात भरउखडे पड़े हैं आँगन मेंसच की आँधी झेल कर।

मं शर्मा (रजा)

Read more Earn more Learn more