काठ की हाँडीएक बार चढ़ी हैकाठ की नौकाहर बार चली हैसाँच को कोईआँच न लगी हैझूठ की कहींदाल न गली है।मं शर्मा (रज़ा)
काठ की हाँडीएक बार चढ़ी हैकाठ की नौकाहर बार चली है
साँच को कोईआँच न लगी हैझूठ की कहींदाल न गली है।
मं शर्मा (रज़ा)