जहाँ जाऊँ तू दिखता हैअद् भुत तेरी क्षमता हैमुझ सा नहीं दिखता हैकिसी और जहां का लगता हैमैं याचक हूँ तू दाता हैमुझ सा कैसे हो सकता हैहम में न कोई समता हैपर कुछ तो तुझसे रिश्ता है ।मं शर्मा (रज़ा)
जहाँ जाऊँ तू दिखता हैअद् भुत तेरी क्षमता हैमुझ सा नहीं दिखता हैकिसी और जहां का लगता है
मैं याचक हूँ तू दाता हैमुझ सा कैसे हो सकता हैहम में न कोई समता हैपर कुछ तो तुझसे रिश्ता है ।
मं शर्मा (रज़ा)