Poetry 1 min read 133.3K reads

समानता


जहाँ जाऊँ तू दिखता हैअद् भुत तेरी क्षमता हैमुझ सा नहीं दिखता हैकिसी और जहां का लगता है

मैं याचक हूँ तू दाता हैमुझ सा कैसे हो सकता हैहम में न कोई समता हैपर कुछ तो तुझसे रिश्ता है ।

मं शर्मा (रज़ा)

Read more Earn more Learn more