शाम ढले रात का इंतज़ार करते हैंहम गुज़रे दिनों को याद करते हैंरात भर तुम से तुम्हारी बातें करकेतुम्हारे बोलने का इंतज़ार करते हैंइश्क की रूसवाईयां ये खालीपनक्या तुमको भी यूँही परेशान करते हैं।मं शर्मा (रज़ा)
शाम ढले रात का इंतज़ार करते हैंहम गुज़रे दिनों को याद करते हैंरात भर तुम से तुम्हारी बातें करकेतुम्हारे बोलने का इंतज़ार करते हैंइश्क की रूसवाईयां ये खालीपनक्या तुमको भी यूँही परेशान करते हैं।
मं शर्मा (रज़ा)