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सागर किनारै


महलों की नहीं चाह मुझकोप्रकृति की छाँव में रहना हैसागर की सीली सी रेत परएक सपनों का घर बनाना है

साँझ सकारे सागर किनारेआती जाती लहरों को गिनना हैइस सृष्टि के सृजनकर्त्ता कोनित शत शत नमन करना है ।

मं शर्मा (रज़ा)

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