सदमे में हूँ

जब से गुमा हूँ

खुद अपनी देह की

कैद में फँसा हूँ


गुलज़ार था

कल तक मैं भी

आज खिज़ां का

मौसम हुआ हूँ ।


मं शर्मा (रज़ा)