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रेत


रेत पर लिखी इबारत नहींकि मिट जाऊँगापत्थर पर खिंची लकीर हूँगहराता जाऊँगा

इस समुंदर की लहरों काखौफ किसे हैआते वक्त में भी यूँहींपहचाना जाऊँगा।

मं शर्मा (रज़ा)

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