रेत के दरो दीवाररेत के फर्श थेरेत की ही तरहफिसलते स्पर्श थेवक्त के बहाव मेंटूटे सबके दर्प थेढह गए एक दिनरेत के जिनके घर थे ।मं शर्मा( रज़ा)
रेत के दरो दीवाररेत के फर्श थेरेत की ही तरहफिसलते स्पर्श थे
वक्त के बहाव मेंटूटे सबके दर्प थेढह गए एक दिनरेत के जिनके घर थे ।
मं शर्मा( रज़ा)