रफ्ता रफ्ता ही ढहते हैं मरहलेएक दिन में भरते नहीं पापों के घड़ेरफ्ता रफ्ता होती दुखों की बारिशेंरफ्ता रफ्ता मिलते हैं कर्मों के सिले।मं शर्मा (रज़ा)
रफ्ता रफ्ता ही ढहते हैं मरहलेएक दिन में भरते नहीं पापों के घड़ेरफ्ता रफ्ता होती दुखों की बारिशेंरफ्ता रफ्ता मिलते हैं कर्मों के सिले।
मं शर्मा (रज़ा)