माँ धैर्या थी
हर कष्ट में धीरज बँधाती रही
पिता संबल दे
हर हार को हराना सिखाते रहे
एक दूजे के पूरक दोनों
मुझको संपूर्ण करते रहे।
मं शर्मा (रज़ा)


माँ धैर्या थी
हर कष्ट में धीरज बँधाती रही
पिता संबल दे
हर हार को हराना सिखाते रहे
एक दूजे के पूरक दोनों
मुझको संपूर्ण करते रहे।
मं शर्मा (रज़ा)