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प्रेमवर्षा


दूर हूँ तुमसे बहुत मगरतुम्हीं को निहारा करता हूँफैलाकर अपनी बाहें प्रियेतुमको महसूस करता हूँ

जग का बोझ उठाते उठातेधरा तुम बहुत कठोर हुईमैं अंबर प्रेम-वर्षा कर केतेरे ह्रदय में भाव जगाता हूँ।

मं शर्मा (रज़ा)

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