दुख में दिल दुखता है
भीतर तक चुभता है
रंजिशों के इस दौर में
प्रतिकार को मन करता है
कब आता कब जाता है
ये मौसम कैसा होता है
खुशियों को जीने का
अधिकार मेरा भी बनता है
कैसे क्षमा करूँ उसको
सीना छलनी करता है
शिव नहीं पी लूँ गरल को
मन मेरा भी अमृत चाहता है।
मं शर्मा(रज़ा)

