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प्रतिबिंब


नदी किनारेसाँझ सकारेकितने प्रतिबिंबनित बैठ निहारे

इन्हें छूने कोपकड़ रखने कोकितने ही पलव्यर्थ गंवाए

उड़ते पंछी होंकि डोलते साएहाथ किसी केकभी न आए।

मं शर्मा (रज़ा)

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