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प्रचंड


उजालों का पुँज हूँरोशनी की किरण हूँरोके से ना रूकी हूँबंद दरवाज़ों से फूटी हूँअंधकार पर प्रहार करजगमगाती प्रचंड हूँ।

मं शर्मा (रज़ा)

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