कुछ राज़ पोशीदा रह गएसमय की सिलवटों मेंयादों की धूल उड़ती रहीरहस्यों के मरघटों में ।मं शर्मा (रज़ा)
कुछ राज़ पोशीदा रह गएसमय की सिलवटों मेंयादों की धूल उड़ती रहीरहस्यों के मरघटों में ।
मं शर्मा (रज़ा)