नित निहारा करता है पेड़भूख को उड़ानें भरते हुएखिलता मन देख कोटरों मेंनौनिहालों को चहकते हुएचिलचिलाती धूप में जबसाया भी साथ चलता नहींफर्ज है मेरा आश्रय देनापेड़ मानता है जताता नहीं।मं शर्मा (रज़ा)
नित निहारा करता है पेड़भूख को उड़ानें भरते हुएखिलता मन देख कोटरों मेंनौनिहालों को चहकते हुए
चिलचिलाती धूप में जबसाया भी साथ चलता नहींफर्ज है मेरा आश्रय देनापेड़ मानता है जताता नहीं।
मं शर्मा (रज़ा)