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पर्णविहीन


सूख गए पानी के सोतेबादल नित रीते ही गरजेधरती की प्यास रह गई प्यासीमेरी आखिर कौन बुझाए

झड़ गए कोमल पत्ते सारेभूख प्यास से निढाल बेचारेखुद अपनी छाया को तरसाखड़ा ठूँठ सा खुद से लजाता।

मं शर्मा (रज़ा)

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