प्रीत की रीत की

जीत के गीत की

राह वो पथरीली

हमसे न चढ़ी गई


राह से रपट कर

दामन झटक कर

चाह वो कसक भरी

मन से न भुलाई गई


नियति के कोष से

मिल रहे पारितोष के

घुमड़ते हुए रोष की

धुंध न मिटाई गई ।



मं शर्मा (रज़ा)