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पराग


मैं सीमित धरा सरीखातुम अनंत असीम गगन प्रियेमैं केवल शब्दों का युग्म हूँतुम जीवन का व्याकरण प्रिये

मैं ठहरे हुए पतझड़ जैसातुम जीवन का बसंत प्रियेमैं हवाओं में फैली खुशबूतुम जीवन का पराग प्रिये।

मं शर्मा (रज़ा)।।

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