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परछाईं


बन कर जीवन संगिनीजीवन भर संग चलती रहीकभी आगे कभी पीछे मेरेयूँ ही घटती बढ़ती रही

आज भी पीछा करती हैशायद मुझमें ही कहीं रहती हैलेकिन अब मेरी परछाईमुझको डरा नहीं पाती है।

मं शर्मा( रज़ा)

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