भीतर बसा घना बियाबांबाहर क्यों ये ऊधम हैसूनी शुष्क आँखों वालीपलकें आखिर क्यों नम हैपाँव के छाले भर जाएंगेवक्त के पास मरहम हैपाँव ज़मीं पर नहीं रखेंगेउड़ने को आसमां क्या कम है।मं शर्मा (रज़ा)
भीतर बसा घना बियाबांबाहर क्यों ये ऊधम हैसूनी शुष्क आँखों वालीपलकें आखिर क्यों नम है
पाँव के छाले भर जाएंगेवक्त के पास मरहम हैपाँव ज़मीं पर नहीं रखेंगेउड़ने को आसमां क्या कम है।
मं शर्मा (रज़ा)