Poetry 1 min read 399.2K reads

पलकें


भीतर बसा घना बियाबांबाहर क्यों ये ऊधम हैसूनी शुष्क आँखों वालीपलकें आखिर क्यों नम है

पाँव के छाले भर जाएंगेवक्त के पास मरहम हैपाँव ज़मीं पर नहीं रखेंगेउड़ने को आसमां क्या कम है।

मं शर्मा (रज़ा)

Read more Earn more Learn more