आँखों के दर पेपलकों के पहरे हैंगुफ्तगु हो कैसेसंशय के घेरे हैं।उजाले भी होंगेअभी तो अंधेरे हैंइसी आस में हमकब से ठहरे हैं।मं शर्मा (रज़ा)
आँखों के दर पेपलकों के पहरे हैंगुफ्तगु हो कैसेसंशय के घेरे हैं।
उजाले भी होंगेअभी तो अंधेरे हैंइसी आस में हमकब से ठहरे हैं।
मं शर्मा (रज़ा)